सामाजिक विज्ञान मूल्यांकन की प्रमुख विधियाँ


सामाजिक विज्ञान मूल्यांकन की प्रमुख  विधियाँ


मूल्यांकन की परिभाषा :-

क्विलिन व हन्ना के अनुसार मूल्यांकन की परिभाषा :-

’’छात्रों के व्यवहार में विद्यालय द्वारा लाए गए परिवर्तनों के विषय में प्रमाणों के संकलन और उसकी व्याख्या करने की प्रक्रिया ही मूल्यांकन है।’’


एम एन डन्डेकर के अनुसार मूल्यांकन की परिभाषा :-

’’मूल्यांकन की परिभाषा एक व्यवस्थित रूप में की जा सकती है जो इस बात को निश्चित करती है कि विद्यार्थी किस सीमा तक उद्देश्य प्राप्त करने में समर्थ रहा।’’

 सामाजिक विज्ञान मूल्यांकन की प्रमुख  विधियाँ

 सामाजिक विज्ञान मूल्यांकन की प्रमुख  प्रविधियाँ निम्न हैं –

  1. निरीक्षण प्रविधि- परीक्षण के द्वारा छात्रों के सामाजिक विकास, संवेगात्मक तथा बौद्धिक परिपक्वता के बारे में ज्ञात किया जाता है। निरीक्षण के द्वारा जब हमें ज्ञात हो जाता है कि बालकों में कौन-कौन सी आदतें विकसित हुई हैं। इसी कारण यह प्रविधि आदतों तथा कुशलताओं के विकास के परीक्षण हेतु उपयोगी है।

2 साक्षात्कार प्रविधि- साक्षात्कार के द्वारा छात्रों की रुचि में वृद्धि तथा मनोवृत्ति में परिवर्तन का ज्ञान होता है। साक्षात्कार छात्रों की विभिन्न व्यक्तिगत विशेषताओं के परीक्षण करने में विशेष मदद पहुंचाता है। साक्षात्कार मूल्यांकन का एक महत्वपूर्ण साधन है, जिसके आधार पर शारीरिक तथा व्यावहारिक पहलुओं का प्रत्यक्षीकरण होता है एवं प्रश्नोत्तर रूप में आमने-सामने एक-दूसरे की समस्याओं को समझने में सुमगता होती है। प्राप्त समंकों की पुष्टि की जा सकती

3.प्रश्नावली प्रविधि- प्रश्नावली का प्रयोग छात्रों से कई तरह की सूचनाएँ प्राप्त करने के लिए किया जाता है। छात्र प्रश्नों की श्रृंखला के प्रति अपनी रुचि एवं योग्यता के अनुसार अनुक्रिया व्यक्त करते हैं। “प्रश्नों की वह क्रमिक श्रृंखला, जो किसी विशिष्ट उद्देश्य की पूर्ति हेतु निर्मित की जाती है, प्रश्नावली कहलाती है।”

  1. जाँच-सूचियाँ प्रविधि- प्रयोगात्मक ज्ञान, अभिवृत्तियों, रुचियों आदि के संबंध में छात्र की निष्पत्तियों का पता लगाना जाँच सूची का उद्देश्य होता है। इसका उपयोग आत्म-मूल्यांकन हेतु भी किया जाता है। जाँच-सूची के विषय में राइटस्टोन का कथन है- “जाँच-सूची, जैसा कि इसके नाम से स्पष्ट होता है, कुछ चुने हुए शब्दों,वाक्यांशों, वाक्यों या अनुच्छेदों की एक सूची होती है, जिसके समक्ष निरीक्षण () इस तरह का चिन्ह अंकित कर देता है,जो निरीक्षक की उपस्थिति अथवा अनुपस्थिति का सूचक होता है।”

जाँच-सूची की रचना करते समय निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए-

(1) उद्देश्य स्पष्ट तथा निश्चित हो।

(2) कथन-सूची विश्लेषण द्वारा भली भाँति विकसित की गयी हो।

(3) हर कथन विशिष्ट तथा कार्य-पूरक के रूप में दिया गया हो।

(4) कथन निश्चित क्रम में तर्क पर आधारित हो।


  1. छात्रों द्वारा निर्मित वस्तुएँ- छात्रों द्वारा जो वस्तुएँ बनायी जाती हैं, वे वस्तुएँ भी व्यवहार संबंधी सूचनाएँ प्रदान करने के महत्वपूर्ण साधन हैं। उदाहरण के लिए-कागज, लकड़ी अथवा मिट्टी की बनायी हुई वस्तुएँ छात्रों की कुशलताओं तथा रुचियों के विषय में अच्छी जानकारी प्राप्त करती हैं।
  2. क्रम निर्धारण मान या मापनी– इसे निर्धारण मापनी भी कहते हैं। राइटस्टोन ने निर्धारण मापनी के विषय में लिखा है- “निर्धारण मापनी में कुछ शब्दों,वाक्यों,वाक्यांशों अथवा अनुच्छेदों की सूची होती है, जिसके सामने निरीक्षण करने वाला मूल्यों के किसी वस्तुनिष्ठ मापनी के आधार पर कोई मूल्य अथवा क्रम अंकित करता है।”

इस विधि का प्रयोग सीमित है। इसका प्रयोग उन विशेषताओं का मूल्यांकन करने हेतु किया जाता है, जिसको विभिन्न मात्राओं में पेश किया जा सकता है, निर्धारण मापनी जाँच बिन्दुओं अथवा नौ बिन्दुओं की हो सकती है।

  1. अभिलेख प्रविधि- इस प्रविधि में छात्रों द्वारा लिखी गयी डायरियाँ, अध्यापकों द्वारा तैयार किये गये घटना-वृत्त एवं संचित अभिलेख-पत्र आदि शामिल किये जाते हैं। ये भी मूल्यांकन की महत्वपूर्ण प्रविधियाँ हैं। इनका संक्षिप्त परिचय इस तरह है

(i) छात्रों की डायरियाँ- छात्रों की डायरियों से उनकी रुचियों, अभिरुचियों, व्यक्तिगत तथा सामाजिक समस्याओं की पर्याप्त जानकारी प्राप्त होती है।

(ii) घटना वृत्त- घटना वृत्तों के द्वारा छात्र के व्यवहार से संबंधित विशिष्ट जानकारी प्राप्त होती है। इसके द्वारा बालकों के दूसरों के प्रति दृष्टिकोण तथा व्यक्तित्व के विशेष पक्षों के विषय में भी ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।

(iii) संचित अभिलेख-पत्र- इसमें छात्रों की योग्यताओं शैक्षिक प्रगतियों तथा अन्य सूचनाओं का क्रमशः वर्णन किया जाता है। छात्रों के सभी तरह के परीक्षणों का विवरण भी इस अभिलेख में अंकित किया जाता है। यह वर्णन प्रायः तीन वर्ष का होता है। बालक की शारीरिक, पारिवारिक, सामाजिक, बौद्धिक एवं मनोवैज्ञानिक सभी बातें इस अभिलेख में अंकित की जाती

  1. परीक्षा प्रविधि- परीक्षा प्रविधि में प्रायः कई तरह की परीक्षाएँ शामिल की जाती हैं। ये परीक्षाएँ निम्न हैं-

(i) लिखित परीक्षा– हमारे विद्यालयों में प्रायः लिखित परीक्षाओं का प्रयोग किया जाता है। ये परीक्षाएँ निबन्धात्मक तथा वस्तुनिष्ठ दोनों ही तरह की होती हैं। इन परीक्षाओं के अन्तर्गत कार्य सौंपना, प्रतिवेदन अंकित करना तथा कागज, पेन्सिल की परीक्षाएँ आती हैं। ये परीक्षाएँ ज्ञान उपलब्धि के मूल्यांकन हेतु विशेष उपयोगी होती हैं। इनसे बालकों में प्रत्यास्मरण, विषय-सामग्री के संगठन, विश्लेषण तथा संश्लेषण की योग्यता का पता चलता है। ये परीक्षाएँ प्रमाणीकृत भी हो सकती हैं तथा अध्यापकों द्वारा निर्मित भी। जो परीक्षण अध्यापक द्वारा बनाये जाते हैं, उनका सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि शिक्षक कक्षागत परिस्थितियों का ध्यान रखते हुए वांछित व्यवहारों का मापन कर सकता है । इन परीक्षाओं के दो रूप ज्यादा प्रचलित हैं-प्रथम निबन्धात्मक एवं द्वितीय, वस्तुनिष्ठ अथवा नवीन तरह की परीक्षा।

(ii) मौखिक परीक्षा- इस तरह की परीक्षा में मौखिक प्रश्न, वाद-विवाद अथवा विचार-विमर्श के द्वारा हम छात्रों के सूचनात्मक ज्ञान तथा अध्ययन की योग्यता की जाँच करते हैं। इन परीक्षाओं का प्रयोग लिखित परीक्षाओं के पूरक के रूप में किया जाता है। छात्रों के वैयक्तिक गुणों की जानकारी हेतु मौखिक परीक्षा विशेष उपयोगी होती है।

(iii) प्रायोगिक परीक्षा- प्रायोगिक परीक्षा का प्रयोग, प्रयोगिक विषयों; जैसे-विज्ञान, भूगोल एवं कृषि आदि में किया जाता है। ऐसी परीक्षाओं से बालकों की प्रायोगिक शक्ति तथा कौशल का अनुमान लगाया जा सकता है।

  1. व्यक्ति इतिहास प्रविधि- इसके भीतर व्यक्ति स्वयं ही अपने विषय में लिखता है, जिससे उसके विषय में जानने से मूल्यांकन में काफी मदद मिलती है।
  2. व्यक्ति अध्ययन प्रविधि- इस प्रविधि में व्यक्ति से संबंधित सूचनाएँ एकत्रित की जाती हैं। उन्हें व्यवस्थित करके उसकी समस्याओं को सुलझाने में मदद प्राप्त की जाती है तथा उनके अनुसार ही सुधारने की योजना तैयार की जाती है।




Epam Siwan 


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